उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की पुस्तक का विमोचन, इतिहास को बताया जीवंत
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उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने संविधान सदन में सुधा मूर्ति की पुस्तक का विमोचन करते हुए इसे भारत की सभ्यतागत यात्रा का जीवंत दस्तावेज बताया।
पुस्तक में 124 भित्ति चित्रों के माध्यम से सिंधु घाटी से आधुनिक भारत तक की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक परंपराओं को दर्शाया गया है।
उपराष्ट्रपति ने “राष्ट्र प्रथम” की भावना अपनाने का आह्वान करते हुए नागरिकों से देश के विकास में सक्रिय योगदान देने की अपील की।
NEW Delhi/ नई दिल्ली स्थित Constitution Hall में आयोजित कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के अध्यक्ष सी.पी. राधाकृष्णन ने सुधा मूर्ति की पुस्तक का लोकार्पण किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि संसद की भित्ति चित्र केवल कला नहीं, बल्कि भारत के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज हैं।
उन्होंने कहा कि यह पुस्तक 124 भित्ति चित्रों के माध्यम से भारत की हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता, संस्कृति और लोकतांत्रिक परंपराओं को विस्तार से दर्शाती है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक भारत तक की यात्रा इसमें बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत की गई है।
उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में भारत को “लोकतंत्र की जननी” बताते हुए कहा कि देश में लोकतांत्रिक परंपराएं प्राचीन काल से ही समाज में गहराई से रची-बसी हैं। उन्होंने वैशाली और दक्षिण भारत की कुडावोलाई प्रणाली का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत में लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों का हिस्सा है।
उन्होंने महान कवि Subramania Bharati का उल्लेख करते हुए भारत की ज्ञान, गरिमा और सांस्कृतिक समृद्धि को रेखांकित किया। साथ ही प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व में संसद में पारंपरिक प्रतीकों के समावेश की सराहना की। उन्होंने चोल वंश के पवित्र सेन्गोल का जिक्र करते हुए इसे भारत की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने वाला प्रतीक बताया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद संवाद, वाद-विवाद और असहमति का मंच है, लेकिन इन सबका उद्देश्य अंततः राष्ट्रहित में निर्णय लेना होना चाहिए। उन्होंने नागरिकों से “राष्ट्र प्रथम” की भावना अपनाने और देश के विकास में सक्रिय योगदान देने की अपील की।
इस अवसर पर Om Birla, J. P. Nadda, Manohar Lal Khattar और Harivansh Narayan Singh समेत कई वरिष्ठ नेता और अधिकारी मौजूद रहे।
उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से इतिहास को जीवंत बनाने का कार्य किया है। यह पुस्तक न केवल अतीत को समझने का माध्यम है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है।